आज हम समझने की कोशिश करेंगे अंग्रेजों ने भारत
में मुगलों का शासन कैसे खत्म किया, जो काम राजपूत अफगान मराठा आदि
नहीं कर पाए वह काम अंग्रेजों ने कैसे कर दिखाया ! इसे समझने के लिए हमें 17वीं और 18वीं शताब्दी के
धार्मिक राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक हर तरह के पहलू के साथ राजों
रजवाड़ों और राज्यों के बीच
सत्ता संघर्ष को अच्छे से समझना होगा और इसके लिए हमें जाना होगा 16 वीं शताब्दी में
जब ब्रिटिश भारत में व्यापारी के रूप में आए इसकी शुरुआत होती है इंग्लैंड में
जहां महारानी एलिजाबेथ के रॉयल
चार्टर से भारत में व्यापार करने की इजाजत लेकर
कुछ ब्रिटिश मर्चेंट
ने भारत का रुख किया और अपनी कंपनी को ईस्ट
इंडिया कंपनी नाम दिया!
अंग्रेजों के भारत में सफल होने के राजनितिक
कारण -
महारानी से चार्टर
प्राप्त करने के बाद सबसे पहले
अंग्रेज कैप्टन हॉकिंस मुगल सम्राट जहांगीर के
दरबार में पहुंचे और इंग्लैंड के साथ व्यापार करने का प्रस्ताव दिया जिसे मुगल
सम्राट जहांगीर ने पुर्तगालियों के दबाव में आकर मना कर दिया लेकिन ब्रिटिश, जहांगीर को यह
समझाने में सफल हो जाते हैं कि वह व्यापार में पुर्तगालियों से अधिक कर देने के
साथ मुगल सम्राट जहांगीर के प्रति पूरी तरह से वफादार रहेंगे जिसके बाद जहांगीर ने
उन्हें व्यापार करने की इजाजत दे दी दरअसल ब्रिटिश चाणक्य के विषय में कुछ भी नहीं
जानते थे लेकिन जाने अनजाने वे चाणक्य की साम दाम दंड और भेद की नीतियों को अपना
रहे थे!
जहांगीर द्वारा
दिए गए शाही फरमान के जरिए सालाना कर के बदले अंग्रेजों को पूरे मुगलिया सल्तनत
में व्यापार करने की छूट कल कारखाने लगाने की इजाजत मिल जाती है जिसके बाद
सर्वप्रथम अंग्रेजों ने सूरत में कारखाने का निर्माण किया इसके बाद पटना मद्रास
मुंबई मे भी कारखानों का निर्माण किया गया !
जिससे इन क्षेत्रों में शहरीकरण तेजी से होने
लगता है तथा दूर-दूर से भारतीय व्यापारी इन शहरों का रुख करने लगते हैं व्यापार
में होता मुनाफा देख अंग्रेजों के हौसले काफी बढ़ जाते हैं और उन्हें यह समझते देर
नहीं लगती की भारत में लालच देकर अपना काम निकालना बहुत ही आसान है इसके साथ ही वह
यहां के राजे रजवाड़ों की आपसी सत्ता संघर्ष से भी भली भांति परिचित हो चुके थे!
जिससे अंग्रेजों को एक बात
समझ आ गई कि भारत में सत्ता को हथियाना काफी
आसान होगा और एक बार राजनीतिक शक्ति अपने हाथ में आने पर व्यापार करना भी अत्यंत
सरल हो जाएगा और इसी लालच में अंग्रेजों ने
मुगल सम्राटऔरंगजेब के खिलाफ युद्ध की घोषणा
लेकिन इस युद्ध में अंग्रेजो को मुंह की खानी पड़ी इस युद्ध में हुई हार से
अंग्रेजों ने चाणक्य की
भेद नीति का महत्व समझा जिसका अर्थ है फूट डालो
और राज करो अंग्रेज बड़ी ही
चालाकी और बेशर्मी से औरंगजेब से माफी मांग लेते हैं साथ ही साथ औरंगजेब भी भारतीय
शिल्प कारों वस्तु कारों और व्यापारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए ₹15000 के जुर्माने का दंड देने के
साथ अंग्रेजों को माफ कर देते हैं और यही माफी अंग्रेजों के लिए वरदान साबित होती
है सन 1707 में औरंगजेब की
मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य में सत्ता के लिए संघर्ष तेज हो जाता है और कई कमजोर
शासकों के आने के कारण मुगल साम्राज्य पतन की ओर आगे बढ़ने लगता है जिसका सीधा
फायदा अंग्रेजों को मिला! मुगल सम्राट फारुख सियार द्वारा सालाना कर
के बदले अंग्रेजों को चुंगी रहित व्यापार करने की इजाजत दे देते हैं इसके तहत अंग्रेज अपने
उत्पादन पर दस्तक जारी कर सकते हैं इसका अर्थ था कि कोई भी स्थानीय राजा कोई भी
अतिरिक्त कर नहीं लगा सकता था लेकिन अंग्रेज मुगल सम्राट से मिले दस्तक प्रणाली की
इजाजत का दुरुपयोग करने लगे जिसे बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने बंगाल में रोक
दिया!
वही 1739 में नादिरशाह ने भारत
पर आक्रमण कर दिया उस समय के मुगल सम्राट मोहम्मद शाह किसी भी प्रकार के बाहरी
हमले के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे
इस हमले में नादिरशाह कोहिनूर हीरे के साथ मयूर
सिंहासन को अपने साथ ले गया
बाहरी आक्रमण और उस से हुए नुकसान के कारण जनता
के मन में मुगल सम्राट के प्रति असंतोष का भाव उत्पन्न हो जाता है जिसका फायदा
तत्कालीन मराठों और अंग्रेजों ने उठाया! सबसे पहले अंग्रेजों ने बंगाल के नवाब
सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर को बंगाल के ही बड़े बैंकर जगत सेठ के सहायता से सिराजुद्दौला के
खिलाफ अपने साथ मिलाने में कामयाब हो जाते हैं और 1757 की प्लासी की लड़ाई
में सिराजुद्दौला को हराकर
मीर जाफर को बंगाल का नवाब घोषित कर देते हैं सिराजुद्दौला के
हार जाने से बंगाल में भी
दस्तक प्रणाली को लागू करने में अंग्रेजों को सहूलियत हुई! वहीं दूसरी तरफ
मराठाओं ने शाह आलम से मिलकर
उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का वादा किया
इसी बीच अहमद शाह अब्दाली ने मुगल सल्तनत पर
हमला कर दिया जिसमें मराठों और अब्दाली की सेना के बीच पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई
इस युद्ध में मराठों की तो हार हो गई लेकिन अहमद शाह अब्दाली भी दिल्ली की गद्दी
संभालने में सक्षम नहीं था
कहते हैं पानीपत की तीसरी लड़ाई से यह तो तय
नहीं हुआ कि भारत का अगला सम्राट कौन बनेगा लेकिन यह जरूर तय हो गया की भारत में सत्ता पर काबिज
होने के लिए कोई भी मजबूत दावेदार नहीं बचा इस बात का पूरा फायदा अंग्रेजों ने
उठाया और सन 1764 में बक्सर की
लड़ाई के दौरान मीर कासिम
शाह, आलम द्वितीय और
अवध के नवाब की संयुक्त सेना को अंग्रेजों ने हरा दिया जिसके फलस्वरूप इलाहाबाद की
संधि मैं अंग्रेजों को बंगाल बिहार व उड़ीसा की दीवानी के अधिकार मिल जाते हैं
लेकिन पानीपत के तृतीय युद्ध में बुरी तरह हारे मराठा अंग्रेजों को सबक सिखाना
चाहते थे जिसके लिए मैसूर मराठा और हैदराबाद कि रियासतें अंग्रेजों को पीछे धकेलने
की एक अंतिम कोशिश करना
चाहती थी लेकिन अब तक अंग्रेज
चाणक्य नीति का इस्तेमाल करना बखूबी जान चुके
थे अंग्रेज मराठों के
आपकी मतभेदों का फायदा उठाकर
गायकवाड, भोसले, होल्कर और सिंधिया के बीच
आपसी मतभेद उत्पन्न करा देते हैं कुछ से दोस्ती और कुछ से दुश्मनी मोलकर! सिंधिया और भोसले ने लॉर्ड वेलेजली
की सहायक संधि को स्वीकार कर लिया जिसके तहत ब्रिटिश, रजवाड़ों को
सुरक्षा प्रदान करने के लिए ब्रिटिश सेना उपलब्ध कराते थे वहीं दूसरी तरफ हैदराबाद
के निजाम को भी अंग्रेज अपने साथ मिलाने में सफल हो जाते हैं फल स्वरुप मैसूर के
टीपू सुल्तान अकेले पड़ जाते हैं और 1799
में हुए चौथे आंग्ल मैसूर युद्ध में वीरगति को
प्राप्त होते हैं!
अंग्रेजों के सफल होने के सामाजिक और आर्थिक
कारण -
मुग़लों और राजे रजवाड़ों ने पारम्परिक तरीकों से
ही शासन किया किन्तु अंग्रेजो ने नित्य नए नए प्रयोग किये जिसमे जमींदार प्रथा, लगान प्रणाली में
सुधार, पारंपरिक कृषि का
आधुनिकीकरण प्रमुख रूप से शामिल है इसके अलावा लार्ड कार्नवालिस द्वारा किये गए
पुलिस सुधारों, लार्ड विलियम
बैंटिक द्वारा अंग्रेजी को कोर्ट व सरकारी दफ्तरों की आदिकारिक भाषा बनाना भी
शामिल है शिक्षा के क्षेत्र में किये गए सुधारों ने राजा राम मोहन रॉय और ईश्वरचंद
विद्यासागर जैसे समाज सुधारक भी अंग्रेजों के समर्थक बैग गए सतीप्रथा का उन्मूल
इसका ज्वलंत उदाहरण है इसके अलावा छुआछूत उंच नीच जैसी सामाजिक बुराइयों ने भी देश
के दबे कुचले वर्ग को अंग्रेजों की तरफ आकर्षित किया 1857 की क्रांति होते
होते अधिकतर राजे रजवाड़ी और ब्रिटिश सेना में शामिल बहुत से भारतीय सैनिक
अंग्रेजो के प्रति वफादार बन चुके थे! आखिरी मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र को कैद कर
रंगून भेज देने के बाद सन 1858
के
भारत शासन अधिनियम के जरिए भारत पर अंग्रेजों
का पूर्ण शासन हो गया!


