तालिबान बनाम अमेरिका : क्या अफगानिस्तान में सब वैसा ही है जैसा दिखाया जा रहा है?

 

दोहा, क़तर में तालिबान प्रमुख मुल्ला अब्दुल घनी बरादार और अमेरिकी राजदूत ज़लमय खलीलजाद के बीच दोहा शांति समझौते पर फ़रवरी 2020 को हस्ताक्षर (ANI)

अमेरिका इतना बेवकूफ नहीं जो 20 सालों की मेहनत पर यूँही पानी फिर जाने दे और इतना नासमझ भी नहीं जो अपने सैनिक साजों सामान यूहीं पीछे छोड़ कर चलता बने! दरअसल अफगानिस्तान के ताज़ा हालात  के पीछे अमेरिका और तालिबान के बीच फ़रवरी 2020 को दोहा, क़तर में हुआ समझौता है! अफगानिस्तान में आज जो भी हो रहा है उसकी नीव 29 फ़रवरी 2020 को क़तर के दोहा में रखी जा चुकी थी जब अमेरिका के राजदूत ज़लमय खलीलजाद और तालिबान प्रमुख मुल्ला अब्दुल घनी बरादार (जो अब तालिबान द्वारा अफगानिस्तान के नए राष्ट्रपति बनाये जा रहे हैं)  के बीच अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए समझौता हुआ जो अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो सेना के वापसी से सम्बंधित था! इस समझौते में 14 महीनो के भीतर अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो सेना की वापसी की बात कही गयी थी!
 
                   क्रमशः   मुल्ला अब्दुल घनी बरादार                                          जलमय खलीलजाद 

दरअसल मिडिल ईस्ट में अपने हितों की रक्षा और चीन को काउंटर करने के लिए अमेरिका द्वारा यह निर्णय लिया गया है! जिस पाकिस्तान पर अमेरिका ने दांव खेला था अब वह चीन की गोद में जा बैठा है ऐसे में मिडिल ईस्ट में अपनी मौजूदगी बनाये रखने और चीन को चुनौती देने के लिए अमेरिका को सैनिक अड्डे की जरूरत पड़ेगी! यह बात अमेरिका भी अच्छी तरह जानता था की जिस दिन नाटो और अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से वापस जायेंगे तालिबान वापस अफगानिस्तान पर कब्ज़ा कर लेगा ऐसे में यह जरुरी था की अफगानिस्तान में सत्ता हासिल करने वाली अगली सरकार से अमेरिका के रिश्ते (कम से कम पर्दे के पीछे) अच्छे हों! दोहा समझौता इसी रणनिति का हिस्सा है! कमोबेस यही हाल तालिबान का भी है जिसे 20 सालों तक अमेरिका और नाटो सेना के कारण अफगानिस्तान के कुछ एक इलाकों तक सिमट कर रहना पड़ा तालिबान यह अच्छे से जानता है की पूरे विश्व से अकेले लड़ना उसके बस की बात नहीं और ना ही सत्ता से दूरी बनाकर वह अपने लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे यही कारण है जो अमेरिका और तालिबान के बीच समझौते की जमीन तैयार हुई!

मौजूदा तालिबान प्रमुख मुल्ला अब्दुल घनी बरादार को पाकिस्तान के कब्जे से छुडवाने का आरोप अमेरिका पर -

बताते चलें की साल 2010 में तालिबान प्रमुख अब्दुल घनी बरादार को पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आई0एस0आई0 ने कराची से गिरफ्तार किया था! साल 2018 के अक्टूबर माह की 24 तारीख को इसी अमेरिका ने अब्दुल घनी बरादार को पाकिस्तान पर दबाव बनाकर छुडवाया जिसके पीछे उसका तर्क था की उसे तालिबान के कब्जे से अपने कुछ पत्रकार व सैनिकों को रिहा करवाना है साथ ही वह अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत का रास्ता तैयार करेगा!

 
पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आई एस आई के कब्ज़े में मुल्ला अब्दुल घनी बरादार 

2000 से 2021 के बीच कितना बदला तालिबान –

ताज़ा जानकारी के अनुसार तालिबान ने जहाँ पहले के मुकाबले अपने हथियारों के जखीरे में इजाफा किया है वही महिलाओ की शिक्षा और अपने कट्टरपंथी विचारधारा में भी परिवर्तन लाया है इस्लामिक शरियत कानूनों को लागू करने के साथ तालिबान का यह नया रूप कितने दिनों तक बरक़रार रहेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा एक अंतर्राष्ट्रीय समाचार चैनल द्वारा पिछले महीने ही तालिबान के कब्जे वाले इलाकों में सर्वे के दौरान तालिबान के संरक्षण में चल रहे मदरसे के दृश्य दिखाए थे जिसमे महिला अध्यापिका द्वारा बच्चियों को शिक्षा देते दिखाया गया था जाहिर है तालिबान इस बात को भलीभांति जानता है कि अगर उसे व्यापक पैमाने पर शासन करना है तो वैश्विक स्तर पर अपनी धूमिल पड़ी छवि को सुधारना होगा यह पहल इसी दिशा में एक कदम हो सकता है, लेकिन बंदूक की नली से निकली सत्ता की चाभी कब तक ठीक तरीके से काम करेगी कहना मुश्किल है क्योंकि आख़िरकार इनका अंतिम उद्द्येश्य तो इस्लामिक शरियत कानून लागू करवाना ही है! जो भी हो इन सब के बीच अगर किसी का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है तो वो है आम अफगान नागरिक हालाँकि तालिबान ने अपने ताज़ा दिए बयान में कहा है की किसी भी अफगान नागरिक को देश छोड़ने या घबराने की जरूरत नहीं है फिर भी देखने वाली बात यह भी होगी की आने वाले दिनों में अफगानिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यको के साथ तालिबान का व्यवहार क्या होगा?




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